अमेरिका से 32 साल बाद डिपोर्ट की गई 73 वर्षीय हरजीत कौर की दास्तान
“पौत्र-पौत्री पूछते हैं—दादी, आपके पास बिस्तर है?”
Mohali मोहाली।
Harjit Kaur Deportation story : अमेरिका में तीन दशक से अधिक (करीब 32 साल) बिताने के बाद जब पंजाब की 73 वर्षीय हरजीत कौर को अचानक भारत डिपोर्ट कर दिया गया, तो उनका जीवन जैसे पलभर में बदल गया। आज वह मोहाली में अपनी बहन के घर अस्थायी रूप से रह रही हैं, लेकिन उनके मन में अमेरिकी पुलिस की “कठोरता” की यादें अब भी ताजा हैं।
हरजीत कौर ने बताया कि अमेरिका में उन्हें हर छह महीने पर इमिग्रेशन दफ़्तर में हाजिरी लगानी होती थी। तय तारीख़ पर जब वह रूटीन चेक-इन के लिए गईं, तो अधिकारियों ने उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया। “गिरफ्तारी के बाद मुझे एक बेहद ठंडे कमरे में बंद कर दिया गया। ओढ़ने के लिए जब कुछ मांगा, तो सिर्फ़ एल्यूमीनियम फॉइल का एक टुकड़ा दिया गया। मेरी आवाज़ किसी ने नहीं सुनी,” वह कहती हैं।
“10 दिन तक अपराधी जैसा व्यवहार”
अगली सुबह उन्हें हथकड़ियों और बेड़ियों में जकड़कर एरिज़ोना के बेक्सविड डिटेंशन सेंटर ले जाया गया। वहाँ दस दिन तक उन्हें अलग-अलग सेल में रखा गया। “सोने के लिए सिर्फ़ एक छोटा-सा लकड़ी का पट्टा था। खाने में ठंडी ब्रेड पर चीज़ और बीफ़ दिया जाता, जिसे मैं खा नहीं सकती थी। मजबूरन मैंने दस दिन तक बस चिप्स, दो बिस्कुट और पानी पर गुज़ारा किया,” हरजीत बताती हैं।
दस दिन बाद उन्हें भारत भेज दिया गया। “मेरे पैरों में बेड़ियां और हाथों में हथकड़ियां थीं। सिर्फ़ विमान में बैठने के बाद उन्हें खोला गया,” वह याद करती हैं।
1992 में दो बेटों के साथ गई थीं अमेरिका
हरजीत कौर 1992 में अपने दो बेटों के साथ अमेरिका गई थीं। अमेरिकी इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एन्फोर्समेंट (ICE) ने उन पर “ग़ैरकानूनी ढंग से रहने” का आरोप लगाकर डिपोर्ट किया। परिवार का कहना है कि उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं है और वह 30 से अधिक वर्षों से वहीं रह रही थीं। उनकी गिरफ्तारी के खिलाफ भारतीय मूल के कई लोग अमेरिका में सड़कों पर उतरे, लेकिन अपीलों के बावजूद रिहाई नहीं मिली।
“अब न अपना घर, न सहारा”
भारत लौटने के बाद हरजीत के पास स्थायी ठिकाना नहीं है। “कभी भाई के पास, कभी किसी और रिश्तेदार के घर रह रही हूं,” वह बताती हैं। सबसे ज़्यादा दर्द उन्हें तब होता है, जब उनके पौत्र-पौत्री वीडियो कॉल पर मासूमियत से पूछते हैं—
“दादी, आपके पास बिस्तर है?”
यह सुनकर उनकी आँखें भर आती हैं। “जिन बच्चों को मैंने अपनी गोद में पाला, आज उसी उम्र में जब सहारे की सबसे ज़्यादा ज़रूरत है, मैं उनसे दूर हूं,” वह धीमी आवाज़ में कहती हैं।



